मंगलवार, 13 जुलाई 2010

गुज़रा कल

उम्र के लम्हे... पड़ाव में गुज़रा कल बार-बार याद आने लगा !

क्यूँ कर मन पुनः वहीँ भाग जाने को मचलने लगा !
ऐसा क्या था उस बीते हुए कल में आकर्षित करता हुआ सा !
हालांकि गुज़रा कल आज कितना अपरिपक्व, बचकाना सा लगता है !
इन सबके बावजूद भी मन उसमें डूब जाने को करता है !
शायद उसमें मदहोश कर देने वाला नशा था !
नहीं तो मन उसके बदले क्यूं इस परिपक्वता को ठुकरा देना चाहता है !
मेरा मन निरंतर भूत और वर्तमान के द्वंद्व में झूल रहा है !
भावनाओं को संयमित होकर जब तर्क का जामा पहनाया !
तो निष्कर्ष सामने खड़ा हो मुझे स्मृतिजीवी घोषित करने लगा !
खैर जो भी हो, मैं भावों को लोक की आँखों से नहीं देखती !
मैं उसी में डूब जाना चाहती हूँ अनंत काल तक !
आप इसे किस रूप में लेंगे आप जानें !
मैंने तो भई अपना रास्ता तय कर लिया, आप अपनी जानें !

1 टिप्पणी:

गुर्रमकोंडा नीरजा ने कहा…

आपकी कविता पढ़कर जीवन की कई घटनाएं स्मृतिपटल पर कौंध गईं.

वास्तव में जीवन है ही इतना विचित्र...किंतु सत्य!