शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

शब्द

 अनुभव का मूर्त रूप !
अपने को व्यक्त करने का सामान....
कितने ही शब्दों को जन्म देकर भी...
मिटी नहीं है प्यास ....
अभी भी ढूँढ़ रहें हैं-और-और...'शब्द' !
शब्द दिखने में कितने छोटे !
पर कितनी ही शताब्दियों के सच को बोते...
हर भाषा का अपना शब्द-विधान !
यदि शब्द ब्रहृ हैं !
तो फिर सब कुछ शब्द में हैं !
लेकिन शब्द रूढ नहीं !
काल के साथ इसका रूप नया...
शब्द अनुभूत बिम्ब की छवि है...!
जहाँ मौन अस्पष्ट कर दें !
वहीं शब्द खोल देते पोल !
अनुभव को शब्द का ज़ामा पहनाना,
बहुत बड़ी साधना है !
शब्द-अर्थ दोनों का चोली-दामन-सा साथ...!
जिनके पास ज्यादा शब्द,
वे सबसे विद्वान !
और जिनके पास कम ?
वे सबसे विरान !
शब्दों से खेलना होगा...
तब ही अपना कुछ गढ़ पाएँगें !
शब्दों का खेल भयकर हो गया !
तब ही वे अनेकार्थी कहलाएँ !
शब्द के स्थान वस्तु... !
खण्डित कर रहीं कल्पना को...!
सृजन का स्थान वस्तुनिष्ठता !
ऐसे में सब मशीन हो जाएँगा !
मनुष्य भी रॉबोट कहलाएँगा !

4 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

शब्द ब्रह्म है
शब्द भ्रम है.
भ्रम माया है
माया से ही ब्रह्म ने
जगत बनाया है.
अर्थ केंद्र है
शब्द काया है.
काया असत्य है , अनित्य है!
शब्द असत्य है,अनित्य है?

छोडिये ...... सब शब्द जाल है.
कविता शब्द जाल है.
शब्द प्रकट कहाँ करते हैं
छिपाया करते हैं.
अर्थ को छिपा जाना ही कविता है.

Udan Tashtari ने कहा…

शब्द के स्थान वस्तु... !
खण्डित कर रहीं कल्पना को...!
सृजन का स्थान वस्तुनिष्ठता !
ऐसे में सब मशीन हो जाएँगा !
मनुष्य भी रॉबोट कहलाएँगा

-शानदार विचारणीय अभिव्यक्ति!

Sunil Kumar ने कहा…

सारगर्भित रचना बधाई

डॉ.कविता वाचक्नवी Dr.Kavita Vachaknavee ने कहा…

यह ऊपर बेनामी द्वारा टिप्पणी में अंकित कविता ( छोडिये ...... सब शब्द जाल है.
कविता शब्द जाल है.
शब्द प्रकट कहाँ करते हैं)

तो शिल्प व कथन से निस्संदेह शर्मा जी की ही जान पड़ती है, और फिर उन्हीं में इतना साहस है कि अपनी रचनाएँ जिस किस के भी नाम कर देते रहे हैं.पर बेनामी के नाम करना! कुछ समझ नहीं आया..