गुरुवार, 22 जुलाई 2010

प्रेम !

प्रेम असीमित हैं !
कुछ भी कहा जा सकता हैं...
प्रेम पर !
और फिर कुछ भी नहीं कहा जा सकता....
प्रेम पर !
सच में कितनी द्वन्द्वात्मकता हैं -'इसमें' !
प्रेम विशाल हैं !
हमारे स्वार्थों से संकुचित हो जाता हैं !
प्रेम बँटा देह-आत्मा, पाप-पुण्य, नैतिकता-अनैतिकता के फेर में...
न जाने प्रेम पर कितने पहरे बैठाए गए !
आसानी से परिभाषित हो नहीं सकता !
प्रकृति की हर हँसती, खेलती, सुन्दर...
वस्तु में इसका दीदार हैं !
इसे पाकर सब तृप्त, शान्त, आनन्दमय...हो जाता है !
यह एक मनोदशा है !
'मनुष्य' जहाँ पहुँचकर अपने को जानता हैं !
निस्वार्थीं होने को पागल करता हैं -'प्रेम' !
प्रेम बहुत बड़ी ताकत हैं !
और जो इसमें असुरक्षा महसूस करते हैं !
वे प्रेम तो नहीं और कुछ करते होंगैं !
मीरा, लैला-मजन्नू, शीरीं -फरहाद, सोनी-महिवाल, शशी-पुन्नो....
प्रेम के स्पिरिट को दर्शाते रहें !
जिन्ह प्रेम कियो, तिन ही प्रभु पायो..!
तो अपने से प्रेम करों...!
दूसरों से अपने आप प्रेम हो जायेंगा !
इसके रूप अनगिनत हैं...!
सारी सकारात्मक सोच प्रेम से उपजी !
खैर इतना कहकर भी प्रेम पर कुछ न कह पाई ।
थोड़ा लिखा बहुत समझना !

2 टिप्‍पणियां:

ana ने कहा…

achchha likha hai apne

बेनामी ने कहा…

aapne kabhee dhyaan diya ki aapkee har kavita kisi na kisi mod par upadeshaatmak kyon ho jaatee hai?