गुरुवार, 3 नवंबर 2011

कुछ मुक्तक


 जिंदगी में आना
  दो वक्त का ख़ाना
 फिर सब भूलाना
  वापस चले जाना।

तेलंगाना का होना
ये है कैसा रोना
राजनीति का खिलौना
जनता का कभी न  होना।

दर्द का आना
जैसे हो फसाना
कभी इधर आना
कभी उधर जाना
और कभी न हो ठिकाना !

आँखों का मोल बड़ा
जो न कहा वह गढ़ा
न कहकर कुछ मढ़ा
जिसे ले तू अढ़ा!

पानी न होता
तो फिर कैसा गोता !
कपड़े कैसे धोता
इंसान कैसे होता !

फूल का खिलना 
जैसे तुमसे मिलना
कली का टूटना
जैसे तुम्हारा रूठना !

दूर से मुसाफ़िर आया
आँखों में कई सपने लाया
हमने उसे बडा शताया
पर आख़िर में वह बड़ा भाया !

शब्दों के बिम्ब 
क्यूँ हो गए पलछिन
जो रहते थे शब्दों से अभिन्न
आज है छिन्न-भिन्न !

साक्षात्कार !
किसका-किससे ? 
मेरा जिंदगी से, 
या जिंदगी का मुझसे ?
आख़िर में क्या फ़र्क पड़ता ?
दोनों तरफ से तो मैं केन्द्र में अड़ता ....!

4 टिप्‍पणियां:

शालिनी पाण्डेय ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...बधाई

Mamta Bajpai ने कहा…

पानी न होता
तो फिर कैसा गोता !
कपड़े कैसे धोता
इंसान कैसे होता !
बहुत सुन्दर

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

sunder muktak.

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

शब्दों के बिम्ब
क्यूँ हो गए पलछिन
जो रहते थे शब्दों से अभिन्न
आज है छिन्न-भिन्न !
साक्षात्कार !
किसका-किससे ?
मेरा जिंदगी से,
या जिंदगी का मुझसे ?

बेहतरीन, वाह !!!