सोमवार, 9 मई 2011

जिंदगी का एक सुखद दिन

9 मई।
पहले से ही तय था कि सर प्रो.ऋषभदेव जी के घर हम सात प्राध्यापकों को संगोष्ठी की सफलता को सेलिब्रोट करने के लिए आमंत्रित किया गया हैं। सबसे एक हफ्ते पहले ही स्वीकृति प्राप्त कर ली गयीथीं। देखते-देखते 9 मई का दिन आ ही गया। सर घर रह सकते थे, परन्तु उनकी भलमनसाहत कि वे हमें लेने सभा आये। पता नहीं शायद सोचा हो कि कहीं हम टाल न जाएँ, अपने वादे के बहुत पक्के हैं सर जी। खैर पहली बार पी.जी विभाग ने दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की गाड़ी ली।
12 बजे दोपहर को सभा से चलने का तय हुआ था तो ठीक 12 बजे हम सब निकले। गाड़ी के चालक लेस्ली जी ने  मनोरंजन  के लिए गाड़ी में गाने लगाए। पहले गाने तेलुगु में थे; मैंने उनसे निवेदन किया कि भई कुछ गाने हिंदी में भी लगा दें। खैर ! हिंदी में गाने शुरू हुए तो बस फिर क्या ! सर शुरू हो गए एक-एक गाने का विश्लेषण करने के लिए, बहुत ही मज़ा आ रहा था। मैं और डॉ. जी नीरजा सर के विश्लेषण को सुन-सुन कर आपस में फुसफुसाते  हुए अपनी टिप्पणी  भी जोड़-जोड़कर मज़ा ले रहें थें। बाकी तीनों प्राध्यापक डॉ. मृत्युंजय सिंह, डॉ.गोरखनाथ तिवारी और डॉ. श्रीनिवास राव भी बाद में हमारे साथ शामिल हो गए। बहुत मज़ा आया।

सर के घर पहुँचते ही हमारे स्वागत के लिए एक स्नेहिल मुस्कान के साथ खड़ी थीं  डॉ. पूर्णिमा शर्मा जी ! सभी ने उन्हें प्रणाम किया और फिर हमें थके हारे समझकर तुरन्त ही मैडम स्प्राइट ले आई। अभी हमने स्प्राइट खत्म भी नहीं किया था कि सर ने इसरार  किया कि- भई भूख लगी है जल्दी खाना खिला दो ! वैसे तो तय हुआ था कि हम सब घर पहुँचकर ही कुछ-न-कुछ मदद करते हुए खाना बना लेंगे । परन्तु मैडम ने  तो सब कुछ तैयार रखा था। हमें बिलकुल कुछ भी नहीं करने दिया गया। छोले की सब्जी, पनीर , काजू  आदि से बनाए खूबसूरत चावल, अचार, पुदीने की चटनी, पापड़, दही, रोटी, पूरी, आईसक्रीम  और न जाने क्या-क्या। मैंने तो भई भरपेट खाया, सच में खाना बहुत बढ़िया  था। मेरे लिए यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा था कि किसे  सबसे बढ़िया कहूँ । शायद यह  मैडम और सर के प्रेम-स्नेह का ही परिणाम था। सच में कितने अजीब लोग हैं । उनका निर्दोष मन हम लोगों को खाते देख कर बहुत प्रफुल्लित हो रहा था। ऐसा लग रहा था कि कोई साधना सफल हो गई हो। इतने सहज और आत्मीय  लोग आज भी दुनिया में हैं; देखकर आँखें थोड़ी नम होने लगीं। खैर ! खाने के बाद पुरुषों  ने बैठकर सर के सेल्फ से कुछ किताबे निकालनी शुरू कीं  तो मज़ाक में ही सर ने अपनी पोल खोल दी कि उन लोगों की नज़रों और हाथों से बचाने के लिए ही आज सवेरे सर ने सारी किताबें मेज और सोफे से उठाकर अलमारी में रख दी थी!

खाने के बाद हम महिलाएँ दूसरे कमरे में जाकर गप्पबाज़ी करने लगीं। सच मैडम से बात कर ऐसा बिलकुल नहीं लगा कि वे हमसे कुछ साल बड़ी हैं। इतना भोलापन और बातों में इतनी स्पष्टता देखकर बहुत अच्छा लगा। उनकी बातें सुनकर ऐसा लगा कि बहुत समय से शायद हम उन्हें जानते हैं ! हमारी बातें चल ही रही थीं कि सर ने दूसरे कमरे से मैडम को फोन कर चाय बनाने का अनुरोध किया। हमारी बातें बीच में ही रह गईं। खैर चाय बहुत स्वादिष्ट  थी, हम सभी ने खूब चुस्कियाँ ले लेकर  पी। चाय के बाद जाने का समय आ गया, परन्तु मन नहीं भरा था। बहुत कुछ मन को छू गया था। उसे बयान करना मुश्किल है, पर अभी भी वे  पल बार-बार आँखों के सामने तरंग की  तरह बह रहे हैं। घर में मैडम ने जो अपना पुराना एलबम दिखाया - शादी का, तो यकीन ही नहीं हुआ कि एलबम की मैडम और आज हमारे साथ बातें कर रही मैडम एक ही हैं। एलबम की फोटो को लेकर बहुत सी चर्चाएँ हुईं। सच हमारी जिन्दगी में ये एलबम एक सुगंध की तरह हमें अपने उस अतीत में ले जाते है जहाँ से हम आज से उसकी तुलना कर आनंदित होते रहते हैं।

खाने के दौरान बार-बार सर  यह मलाल जता रहे थे कि उन्होंने खाने के आइटमों के बनाने में मैडम की कोई मदद नहीं की। आखिर मैडम को खुश करने के लिए सर ने उन्हें 'हे मेरी तुम !' व 'आपके सामने बन्दा  हाजिर है; आपके लिए क्या लाये?' जैसे आकर्षक वाक्यों का प्रयोग कर मैडम को जैसे एक तरह से  सम्मान और धन्यवाद दोनों दे दिए।  

घर से विदा लेते हुए मन में बहुत कुछ था। बार-बार मन बहुत सी चीज़ों का विश्लेषण कर रहा था। मन से बहुत सी सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित हो रही थी। खैर मैडम को प्रणाम कर बाहर निकले और फिर गाड़ी में गीत बजने लगे। हम सभा तक पहुँचने वाले ही थे कि लेस्ली जी ने गाड़ी एक ऐसी जगह जाकर रोकी, जहाँ एक ऐसी तरबूज की बंडी है जहाँ सुबह से शाम तक जाने कितने लोग आकर तरबूज खाते हैं। हमने भी तरबूज खाया और  सभा लौट आए। हम सबको घर पर भोजन के लिए आमंत्रित करने से लेकर वापस लाने तक सर में इतना उत्साह और खुशी थी कि बस ! मैं तो क्या कहूँ। एक सुन्दर दिन देने के लिए  केवल मैं तो मैडम और सर जी को धन्यवाद ही दे सकती हूँ। तो मैडम जी और सर जी मेरा धन्यवाद स्वीकार करें। नमस्कार ! कोई त्रुटि हो गई हो  या अतिरिक्त बोल पड़ी होऊँ तो क्षमाप्रार्थी हूँ। 


ऐसा बहुत कुछ है जो महसूस किया गया, पर शब्द नहीं है कहने को कि आखिर कैसे कहूँ ......      

6 टिप्‍पणियां:

गुर्रमकोंडा नीरजा ने कहा…

९ मई, २०११ - जिंदगी का एक सुखद दिन ही है. हम कभी नहीं भूल सकते हैं इस दिन को. हमारी यादों में हमेशा हमेशा के लिए यह दिन पर्मानेंट मेमोरी में अंकित हो गया है.

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

बहुत सुंदर वर्णन किया इस प्रीति भोज का। मुंह में पानी आया मेन्यु जानकर और मलाल भी रहा कि हम वंचित रह गए; यद्यपि सर जी खुला निमंत्रण दे चुके है। देखें, कब जाना हो॥ आप ने सही कहा, शर्माजी का बचपन झलक जाता है ऐसे अवसरों पर। इस अवसर का आनंद उठाने के लिए आप सब को बधाई। पूर्णिमा बहनजी तो सत्कार में कोई कोर-क्सर नहीं रहने देतीं। हां, शायद मणि घर पर नहीं थी वर्ना वो आपको चित्रकारी के कुछ गुर बता देती :)

बलविंदर ने कहा…

@बहुत-बहुत धन्यवाद श्रद्धेय चन्द्रमौलेश्वर जी। हम तो झूठ-मुठ के इतने व्यस्त रहते है कि किसी का ब्लॉग न पढ़ सकने का रोना हमेशा रोते रहते है, पर सच में हमें आपकी कई-कई ब्लॉगों पर निरंतर और सशक्त टिप्पणियाँ देखकर बड़ा ताजूब होता है कि आप किस तरह से निरंतर हिंदी की सेवा के साथ-साथ व्यक्ति के लिए भी प्रेरणा बनते जा रहें हैं। अब तो आलम यह हो गया है कि ब्लॉग लिखते समय इतना तो यकीन हो ही जाता है कि आप और शर्मा जी ज़रूर लिखें पर टिप्पणी करेंगे। हमारे लिए इससे बढ़कर और कौन-सा सौभाग्य हो सकता है। हम चाहते है कि कभी आप से आपकी रचना प्रक्रिया के बारे में विस्तार से सुने। खैर ! अभी के लिए पुनः आपको धन्यवाद ज्ञापित करती हूँ।

बलविंदर ने कहा…

@ बहुत-बहुत धन्यवाद डॉ.नीरजा जी आपने मेरी बात का समर्थन करके मेरे सुख को और दुगना कर दिया।

डॉ.बी.बालाजी ने कहा…

मन की बात बताना और ऐसी बात जो मन छू लेती है और प्रसन्नता के सागर में बार-बार डुबोती है, ऐसे अनुभव के बारे में कहने के लिए बहुतों के पास शब्द नहीं होते मगर आपने बहुत बढ़िया संस्मरण लिखा है.

पढ़कर मैं अंदाजा लगा सकता हूँ कि २०८ए ब्लाक, सिद्धार्थ अपार्टमेन्ट में आकर आपने क्या और कैसा महसूस किया होगा.विशेषकर मैडम के स्नेह, ममता और आतिथ्य सत्कार को देखकर. मैं उनकी ममता से परिचित तो हूँ ही, उनके परिवार का सदस्य जो हूँ. कभी मौका मिले तो आपको मेरे भी संस्मरण सुनाऊंगा.

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

आभार डॊ. बलविंदर कौर जी जो आपने एक टिप्पणीकार को सराहा :) डॉ. बालाजी अपने संस्मरण अवश्य सुनाएं ... पर हां, अपने ब्लाग पर :)